Friday, 6 April 2018

क्या आप जानते हैं कि पीछे झाड़ू और थूकने के लिए गले में मटकी बांधकर चलते थे दलित

शोषक और शोषित हर समाज और सभ्यता में पाए जाते हैं ऐसा नहीं कि कमजोरों पर अत्याचार सिर्फ भारत में ही हुए अगर ऐसा होता तो पश्चिमी जगत में बुराई से लड़ने के लिए ढेर सारे सुपरहीरो न गढ़े जाते. हर समाज की तरह भारत में भी राजा ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया है, ईश्वर जो कहे वह सही है और इसी कथन पर पहले की न्यायिक व्यवस्था कायम थी. राजा को कुछ चाटूकार मंत्री घेरे रहते थे और वह उन्ही पर विश्वास करता था. इन्ही मंत्रियों और पुरोहितों ने धीरे-धीरे एक सामाजिक व्यवस्था का विकास किया जो समय के साथ-साथ ख़राब होती चली गयी, जाति व्यवस्था ऐसा ही एक तंत्र है.

एक मान्यता के मुताबिक शूद्र महामानव के पैरों से उत्पन्न हुआ है जिसका काम समाज की सेवा करना है जबकि वर्ण व्यवस्था में शूद्र वह व्यक्ति होता था जो निकम्मा और आलसी था और यह किसी भी वर्ण का हो सकता था क्योंकि प्राचीनकाल में जाति अर्जित की जाती थी न कि जन्म पर आधारित, विकास के क्रम में जाति जन्म पर आधारित होती गयी और लालचवश किसी ने इसे रोका भी नहीं. जाति अगर अर्जित न होती तो विश्वामित्र ब्राहमण और रविदास को संत की उपाधि न मिलती. दलित जातियों के काम उनकी जाति के मुताबिक बंटे हुए थे इनमे अधिकतर वे काम थे जिन्हें करने में किसी भी आम आदमी का जी मिचलाने लगे जैसे मैला साफ़ कर उसे ढोना, पर अब इस पर रोक है.

समय के साथ एक नया चलन चला छूत और अछूत जातियों का, अछूत जातियाँ शहर के बाहर बस्तियों में रहती थीं जबकि छूत नगर के केंद्र में. राजा और पुरोहितों पर अगर अछूत जाति के व्यक्तियों की परछाईं भी पड़ जाती थी तो दुबारा नहाकर शुद्ध होने की परंपरा थी. अछूत व्यक्ति के पैरों के निशान सड़क पर न पड़े और उन पर उच्च जाति के व्यक्ति चलकर अशुद्ध न हो जाएँ इसलिए दलितों को अपने पीछे एक झाड़ू बांधकर चलना पड़ता था जिससे उनके क़दमों के निशान मिटते चले. वे नगर में कहीं भी थूक नहीं सकते थे, थूकने के लिए उन्हें गले में हड़िया लटकाकर चलना पड़ता था वे उसी में थूकते और लटकाये रहते थे.

चूँकि व्यवस्था के अग्रिम पायदान पर बैठे लोगों से ही मोक्ष का रास्ता जाता था इसलिए दलित जातियों की मजबूरी थी कि वे उनकी हर बात मानें. अपने प्रिय की मौत पर उसे स्वर्ग मिले इस वजह से पिंडदान आदि के लिए पुरोहितों के पास जाना और उनकी बात मानना दलित समुदाय की मजबूरी थी. हालाँकि बौद्ध धर्म और अशोक के शासनकाल में दलितों पर अत्याचार की घटनाएँ ज़रूर कम हुई लेकिन यह बहुत दिनों तक नहीं रहा मौर्य साम्राज्य के ख़त्म होते ही चीज़ें एक बार फिर बदलने लगी थीं.

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